मैराथन ट्रेनिंग के 7 बड़े झूठ: सच्चाई जानिए

'नो डेज ऑफ' का खतरनाक ट्रेंड और सोशल मीडिया का झूठ

आजकल इंस्टाग्राम खोलो तो हर दूसरा एथलीट '#NoDaysOff' का टैग लगाकर दौड़ता हुआ नजर आता है। इस 'हसल कल्चर' ने नए धावकों के दिमाग में यह कचरा भर दिया है कि एक भी दिन आराम करना कमजोरी की निशानी है। सच कहूं तो यह मैराथन की दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है। आराम करना आलस नहीं, बल्कि आपकी ट्रेनिंग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। World Athletics के अनुसार, रिकवरी के दिन फिजियोलॉजिकल अनुकूलन और मांसपेशियों की सूक्ष्म चोटों (micro-tears) की मरम्मत के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। विज्ञान स्पष्ट है: आपकी मांसपेशियां दौड़ते समय नहीं, बल्कि आराम करते समय मजबूत होती हैं। एक बेहतरीन marathon training plan में 'रेस्ट डे' की अहमियत 'लॉन्ग रन' से कम नहीं होती।
A determined female runner in black
A determined female runner in black

क्या प्रैक्टिस में 42.2 किलोमीटर दौड़ना जरूरी है?

यह लॉजिक सुनने में बड़ा सही लगता है कि अगर रेस के दिन 42.2 किलोमीटर दौड़ना है, तो प्रैक्टिस में भी कम से कम एक बार उतनी दूरी नापनी ही होगी। लेकिन यह एक बहुत बड़ा धोखा है। दिग्गज रनिंग कोच Hal Higdon के स्टैंडर्ड बिगिनर और इंटरमीडिएट प्लान्स इस बात का प्रमाण हैं कि सबसे लंबी दौड़ केवल 20 मील (लगभग 32 किलोमीटर) तक ही सीमित रखी जाती है। इसके पीछे सीधा सा विज्ञान है: 32 किलोमीटर के बाद शरीर को जो भयानक थकान और मांसपेशियों का डैमेज होता है, उससे पूरी तरह उबरने में हफ्तों लग सकते हैं। रेस के दिन भीड़ का उत्साह, एड्रेनालाईन (adrenaline) और सही टेपरिंग (tapering) आपको अंतिम 10 किलोमीटर पार करा देती है। ट्रेनिंग में खुद को 42 किलोमीटर तक निचोड़ लेना केवल ओवरट्रेनिंग और चोट को निमंत्रण देना है।

स्ट्रेचिंग का मिथक: विज्ञान क्या कहता है?

एक और रटा-रटाया ज्ञान जो हर पार्क में सुनने को मिलता है: "दौड़ने से पहले 10 मिनट स्ट्रेचिंग कर लो, कभी चोट नहीं लगेगी।" तथ्य इस धारणा की धज्जियां उड़ाते हैं। PubMed Central पर प्रकाशित विस्तृत शोध स्पष्ट करता है कि दौड़ने से पहले स्टेटिक स्ट्रेचिंग (जहां आप एक पोजीशन को होल्ड करते हैं) करने से एंड्योरेंस रनर्स में समग्र चोट का जोखिम कम नहीं होता है। उल्टे, ठंडी मांसपेशियों पर स्टेटिक स्ट्रेचिंग करने से आपका प्रदर्शन अस्थायी रूप से गिर सकता है।
ध्यान दें: दौड़ शुरू करने से पहले डायनामिक वार्म-अप (जैसे लेग स्विंग्स और ब्रिस्क वॉक) किसी भी होल्डिंग स्ट्रेच से कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी हैं। स्टेटिक स्ट्रेचिंग को हमेशा दौड़ने के बाद (कूल-डाउन) के लिए बचा कर रखें।

महंगे गियर का तमाशा: दिल्ली के ट्रैक्स से एक ग्राउंड रिपोर्ट

अब बात करते हैं उस चीज की जिसने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया है। दिल्ली-एनसीआर की सर्दियों की सुबह। लोधी गार्डन और नेहरू पार्क के आसपास कोहरा छाया होता है। मैं अपनी वार्म-अप रन कर रहा होता हूं और तभी मेरे कानों में चर्चाएं पड़ती हैं— "भाई, ये नए ₹25,000 वाले कार्बन-प्लेटेड जूते लिए हैं, अब तो 3:30 घंटे में मैराथन पक्की है!" 🤦‍♂️ गुस्सा आता है जब देखता हूं कि मार्केटिंग ने लोगों को कैसे अंधा कर दिया है। 2015 से, जब मैंने पहली बार मैराथन की दुनिया में कदम रखा था, तब से लेकर अब तक इन 10 सालों में गियर का जुनून पागलपन में बदल चुका है। सुनिए, जूते आपको मैराथन नहीं जिताते! कार्बन प्लेट वाले जूतों का असली फायदा तब मिलता है जब आप पहले से ही एलीट पेस (4 मिनट/किमी से कम) पर दौड़ रहे हों। अगर आपका पेस 6 या 7 मिनट प्रति किलोमीटर है, तो वह जूता आपकी बायोमैकेनिक्स खराब करके आपको घुटने का दर्द जरूर दे सकता है। लोग 50 हजार की घड़ियां और जूते खरीदते हैं, लेकिन एक अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट पर पैसे खर्च करने में उनकी जान निकलती है। गियर से पेस नहीं खरीदा जा सकता, इसे पसीने से कमाना पड़ता है।

कार्ब लोडिंग का मतलब पेट को डस्टबिन बनाना नहीं है

ट्रेकिंग के दौरान पहाड़ों में मैंने एक अहम सबक सीखा था— शरीर जितना हल्का रहेगा, सफर उतना लंबा तय होगा। लेकिन मैराथन की दुनिया में 'कार्ब लोडिंग' (Carb Loading) के नाम पर लोग खुद के साथ मजाक करते हैं। मुझे आज भी याद है, मैं अपनी एक्सेल स्प्रेडशीट्स (जी हां, मुझे हर चीज़ का डेटा ट्रैक करने की पुरानी बीमारी है) में अपने मैक्रोज़ कैलकुलेट करता था। शुरुआती दिनों में, मैं पुरानी हिंदी फिल्म 'शोले' के गब्बर सिंह की तरह रेस से एक रात पहले टूट कर पास्ता और चावल खाता था। नतीजा? अगले दिन भारीपन और रेस के बीच में पेट खराब होना (GI distress)। क्या मैराथन से एक रात पहले तीन प्लेट पास्ता खाना सही है? बिल्कुल नहीं। हमारा शरीर एक बार में ग्लाइकोजन की एक सीमित मात्रा ही स्टोर कर सकता है। सही कार्ब-लोडिंग रेस से 3-4 दिन पहले शुरू होती है, जहां आप धीरे-धीरे अपने नियमित भोजन में कार्बोहाइड्रेट का प्रतिशत बढ़ाते हैं। किसी भी अच्छे marathon training plan में रेस से ठीक एक रात पहले के खाने को हल्का रखने की ही सलाह दी जाती है।

पेन, एक्सेल शीट और असली सड़क

आखिरी और सबसे बड़ा झूठ यह है कि मैराथन केवल 'सुपरहुमन' एथलीटों के लिए है। मैंने इन 10 सालों के सफर में गृहिणियों को, 60 साल के बुजुर्गों को और आम नौकरीपेशा लोगों को शानदार तरीके से फिनिश लाइन पार करते देखा है। एक्सेल शीट पर बनाये गए परफेक्ट दिखने वाले प्लान्स और दिल्ली की सर्द, धुंधली सड़कों पर दौड़ने के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है। सड़क आपको विनम्र बनाती है। यह एक शारीरिक चुनौती से कहीं अधिक एक मानसिक खेल है। अगर आप इन बेवकूफाना मिथकों को अपने दिमाग से निकाल सकें, सही मार्गदर्शन लें और अपने शरीर की सुनें, तो 42.2 किलोमीटर की यह यात्रा आपकी जिंदगी बदल सकती है। जूते पहनिए, दरवाजे से बाहर निकलिए, लेकिन समझदारी से दौड़िए।
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Raftaar_Rahul

पिछले 9 वर्षों से मैराथन रनिंग के प्रति समर्पित। राहुल एक प्रमाणित रनिंग कोच हैं जिन्होंने दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर की प्रमुख मैराथन में हिस्सा लिया है और अब हिंदी भाषी धावकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं

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